नई दिल्ली | ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) ने तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं को गुजाराभत्ता देने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले को गलत ठहराया है। AIMPLB की वर्किंग कमेटी ने रविवार को एक बैठक कर सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले पर चर्चा की।
इस बैठक में प्रस्ताव पारित किया गया जिसमें कहा गया कि यह फैसला ‘शरिया’ (इस्लामी कानून) के खिलाफ है। लिहाजा AIMPLB सभी संभावित उपायों का पता लगाएगा जिससे सुप्रीम कोर्ट से इस फैसले को पलटने को कह सके।
दरअसल सुप्रीम कोर्ट ने 10 जुलाई को कहा कि तलाकशुदा मुस्लिम महिला अपराध प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 (अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 144) के तहत अपने पति से भरण-पोषण की हकदार है। इसके लिए वह याचिका दायर कर सकती है।
जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की बेंच ने एक मुस्लिम युवक मोहम्मद अब्दुल समद की याचिका को खारिज करते हुए यह आदेश दिया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह फैसला हर धर्म की महिलाओं पर लागू होगा। मुस्लिम महिलाओं को भी गुजारा भत्ता पाने का उतना ही अधिकार है, जितना अन्य धर्म की महिलाओं को।
तलाक घिनौनी चीज, शादी बनाए रखने की हर कोशिश होनी चाहिए
पर्सनल लॉ बोर्ड ने अपने प्रस्ताव में कहा कि बोर्ड ने इस बात पर जोर दिया कि पैगंबर ने कहा था कि जिन चीजों को करने की इजाजत दी गई है, उसमें से तलाक सबसे घृणित चीज है। लिहाजा शादी के रिश्ते को बनाए रखने के लिए सभी वैध उपाय किए जाने चाहिए।
साथ ही इसके बारे में कुरान में जो दिशानिर्देश दिए गए हैं, उनका पालन करना चाहिए। हालांकि, अगर वैवाहिक जीवन बनाए रखना कठिन हो जाता है, तो तलाक को मानवीय समाधान के तौर पर देखा जा सकता है।
एक्सपर्ट बोले- शाह बानो केस के बाद से मुस्लिम महिलाओं को गुजारा भत्ता देने की व्यवस्था
सुप्रीम कोर्ट के वकील महमूद प्राचा ने दैनिक भास्कर को बताया कि मुस्लिम महिलाओं को अभी भी गुजारा भत्ता मिल रहा है। दरअसल, CrPC की धारा 125 के तहत कई मुस्लिम महिलाओं को गुजारा भत्ता दिया जा चुका है।
यही नहीं, शाह बानो केस में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद यह व्यवस्था बनी थी कि तलाकशुदा मुस्लिम महिला को भी पति से गुजारा भत्ता दिया जाएगा। पति भत्ता नहीं दे पाता है तो ऐसी महिलाओं को वक्फ बोर्ड द्वारा भत्ता दिए जाने का प्रावधान है।
