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लोकसभा से पहले मोदी का पसमांदा मुस्लिम पर फोकस क्यों

नई दिल्ली | इसी साल भोपाल में भाजपा के ‘मेरा बूथ-सबसे मजबूत’ कार्यक्रम में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि वोटबैंक की राजनीति करने वालों ने पसमांदा मुसलमानों को तबाह कर दिया है। उनके ही एक वर्ग ने पसमांदा मुसलमानों का शोषण किया है। इस पर कभी चर्चा नहीं हुई। आज भी उन्हें बराबरी का हक नहीं मिलता। ऐसे पसमांदा मुस्लिम को भाजपा से जोड़ा जाए |

देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मुस्लिम वोटर के एक बड़े धड़े को अपनी और खीचने के लिए एक फार्मूला तेयार कर लिया है   ‘मेरा बूथ सबसे मजबूत’ कार्यक्रम के दौरान पीएम ने  पसमांदा मुसलमानों का मुद्दा उठाया। प्रधानमंत्री ने कहा कि वोटबैंक की राजनीति करने वालों ने पसमांदा मुसलमानों को तबाह कर दिया है। हालांकि, यह पहली बार नहीं है जब पीएम ने इस समाज के बारे में बात की हो। इसी साल जनवरी में भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में पीएम ने भाजपा कार्यकर्ताओं और नेताओं को पसमांदा मुसलमानों को पार्टी से जोड़ने के लिए कहा था।

पीएम मोदी के इस बयान के बाद एक बार फिर लोकसभा चुनाव 2024 के पहले पसमांदा मुस्लिमों की चर्चाएं तेज हो गई हैं। ऐसे  में जानना जरूरी है कि आखिर कौन हैं पसमांदा मुसलमान? क्या है इतिहास? देश में इनकी आबादी कितनी है? पसमांदा मुसलमानों के जुड़ने से भाजपा को कोई चुनावी लाभ मिल सकता है? आइये समझते हैं

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसी साल जनवरी में मध्यप्रदेश दौरे पर आए। उन्होंने भोपाल में भाजपा के ‘मेरा बूथ-सबसे मजबूत’ कार्यक्रम के तहत अल्पकालिक विस्तारकों को संबोधित किया। इस दौरान पीएम मोदी ने विपक्षी एकता, महंगाई, समान नागरिक संहिता, भ्रष्टाचार, तीन तलाक और पसमांदा मुसलमानों जैसे तमाम मुद्दों पर अपनी बात रखी।

प्रधानमंत्री मोदी ने कार्यकर्ताओं से कहा कि वोटबैंक की राजनीति करने वालों ने पसमांदा मुसलमानों को तबाह कर दिया है। उनके ही एक वर्ग ने पसमांदा मुसलमानों का शोषण किया है। इस पर कभी चर्चा नहीं हुई। आज भी उन्हें बराबरी का हक नहीं मिलता। उन्हें नीचा और अछूत समझा जाता है। यह सब पिछड़े हैं। इनके साथ इतना भेदभाव हुआ है। हमने सबका साथ, सबका विकास की भावना के साथ इनका भी विकास किया है।

प्रधानमंत्री मोदी ने अपील में कहा कि भाजपा कार्यकर्ता मुसलमानों के पास जाएं और तर्कों और तथ्यों के साथ उन्हें समझाएं, तब उनका भ्रम दूर होगा।

आखिर कौन हैं पसमांदा मुसलमान? 
पसमांदा मूल रूप से फारसी से लिया गया शब्द है। इसका मतलब होता है, वो लोग जो पीछे छूट गए हैं, दबाए गए या सताए हुए हैं। भारत में रहने वाले मुसलमानों में 15 फीसदी उच्च वर्ग के माने जाते हैं। जिन्हें अशरफ कहते हैं। इनके अलावा बाकि 85 फीसदी अरजाल, अजलाफ मुस्लिम पिछड़े हैं। इन्हें पसमांदा कहा जाता है। आंकड़े बताते हैं कि पसमांदा मुसलमानों की हालत समाज में बहुत अच्छी नहीं है। ऐसे मुसलमान आर्थिक, सामाजिक और शैक्षिक हर तरह से पिछड़े और दबे हुए हैं।

क्या है इतिहास?
पसमांदाओं के लिए सामाजिक न्याय हासिल करने के लिए आंदोलन, आजादी से पहले की अवधि में ही शुरू हो चुका था। उस समय जुलाहा (बुनकर) समुदाय से आने वाले अब्दुल कय्यूम अंसारी और मौलाना अली हुसैन असीम बिहारी इस आंदोलन के अग्रणी नेता थे और इन्होंने मुस्लिम लीग की सांप्रदायिक राजनीति का विरोध किया था। इसकी शुरुआत स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान जिन्ना के ‘द्विराष्ट्र सिद्धांत’ का विरोध करने के लिए मोमिन कांफ्रेंस बनाकर की गई थी।

इसके बाद, 1980 के दशक में, महाराष्ट्र के अखिल भारतीय मुस्लिम ओबीसी संगठन ने इस समुदाय के अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ी थी। इसी के बाद महाराष्ट्र में अधिकांश पसमांदा मुस्लिमों को ओबीसी सूची में शामिल किया गया था। 90 के दशक में डॉक्टर एजाज अली (आल इंडिया बैकवर्ड मुस्लिम मोर्चा), अली अनवर (आल इंडिया पसमांदा मुस्लिम महाज), और शब्बीर अंसारी ने अपने-अपने संगठनों के माध्यम से इस आंदोलन को बल दिया था।

क्या हैं राजनीतिक मायने?
माना जाता है कि पसमांदा समाज के लोग देश के लगभग 18 राज्यों में हैं। यूपी, बिहार, राजस्थान, तेलगांना, कर्नाटक, मध्य प्रदेश में इनकी संख्या अधिक है। सबसे ज्यादा संख्या उत्तर प्रदेश में है। हर विधानसभा सीट पर इनकी उपस्थिति अच्छी खासी संख्या में है, जिनमें करीब 44 जातियां जैसे राइनी, इदरीसी, नाई, मिरासी, मुकेरी, बारी, घोसी शामिल हैं।

आंकड़ों के हिसाब से यह वोट बैंक लोकसभा की सौ से अधिक सीटों पर अपना प्रभाव रखता है। जनसंख्या के आधार पर देखें, तो असम और बंगाल में मुस्लिम जनसंख्या 25-30 प्रतिशत, बिहार में करीब 17 प्रतिशत, उत्तर प्रदेश में करीब 20 प्रतिशत, दिल्ली में भी 10-12 प्रतिशत, महाराष्ट्र में करीब 12 प्रतिशत है, केरल में 30 प्रतिशत संख्या मुस्लिम समुदाय की है। बीजेपी मुस्लिम समुदाय के उस वर्ग पर फोकस करने की कोशिश कर रही है जो आमतौर पर विपक्षी दलों का वोट बैंक है।

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