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बड़ौद दुधाखेड़ी माता मंदिर का इतिहास और जीर्णोद्धार की मांग

HEADLINE
  • 29 पीढ़ियों से माता की सेवा, 20 साल से अखंड ज्योत
  • फिर भी जीर्णोद्धार को तरस रहा बड़ौद का प्राचीन दुधाखेड़ी माता मंदिर
  • बड़ौद के दुधाखेड़ी माता मंदिर की अनसुनी कहानी
  • 29वीं पीढ़ी कर रही सेवा; भवन जर्जर, शासन से उम्मीद
  • दूध का भोग, अखंड ज्योत और संतान प्राप्ति की मान्यता…
  • जानिए बड़ौद के प्राचीन दुधाखेड़ी माता मंदिर का इतिहास
पीढ़ियां बदल गईं, आस्था नहीं; अब अपने जीर्णोद्धार का इंतजार कर रहा दुधाखेड़ी माता मंदिर

बड़ौद, आगर मालवा |  कभी संतान प्राप्ति की मान्यता से जुड़ा, तो कभी श्रद्धालुओं की अटूट आस्था का केंद्र… बड़ौद का प्राचीन दुधाखेड़ी माता मंदिर आज अपने संरक्षण की बाट जोह रहा है। पुजारी परिवार की 29वीं पीढ़ी माता की सेवा में जुटी है और करीब 20 वर्षों से मंदिर में अखंड ज्योत प्रज्वलित है। लेकिन मंदिर का पुराना भवन जर्जर हालत में पहुंच चुका है। ऐसे में नवरात्रि के पावन अवसर पर मंदिर के जीर्णोद्धार और संरक्षण के लिए शासन-प्रशासन के सहयोग की मांग उठ रही है।

सदियों पुरानी परंपरा, आस्था का अनूठा केंद्र

मध्यप्रदेश के आगर मालवा जिले के बड़ौद नगर में स्थित प्राचीन दुधाखेड़ी माता मंदिर क्षेत्र की धार्मिक आस्था और परंपराओं का महत्वपूर्ण केंद्र है। यहां शारदीय और चैत्र नवरात्रि के दौरान विशेष धार्मिक आयोजन होते हैं। घटस्थापना के साथ नौ दिनों तक माता रानी का आकर्षक श्रृंगार किया जाता है और बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं।

इस मंदिर की एक विशेष परंपरा माता रानी को दूध का भोग लगाने की है। यही परंपरा मंदिर को क्षेत्र के अन्य धार्मिक स्थलों से अलग पहचान देती है। मंदिर में करीब दो दशक से अखंड ज्योत प्रज्वलित है, जबकि पुजारी परिवार की 29वीं पीढ़ी निरंतर माता की सेवा और पूजा-अर्चना की परंपरा निभा रही है।

संतान प्राप्ति की मान्यता से जुड़ा है मंदिर का इतिहास

स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, प्राचीन समय में दुधाखेड़ी माता एक चबूतरे पर विराजमान थीं। कहा जाता है कि उस समय नगर के एक सेठ के यहां संतान नहीं थी। सेठ ने माता के दरबार में प्रार्थना की और मनोकामना पूरी होने के बाद मंदिर का निर्माण कराया।

इसी मान्यता के चलते आज भी श्रद्धालु माता के दरबार में अपनी मनोकामनाएं लेकर पहुंचते हैं। मंदिर से जुड़ी परंपराओं में लकवे से पीड़ित लोगों का माता की परिक्रमा और आरती में शामिल होना भी बताया जाता है। हालांकि, इन मान्यताओं को धार्मिक आस्था के रूप में ही देखा जाना चाहिए।

आस्था अटूट, लेकिन मंदिर का भवन जर्जर

दुधाखेड़ी माता मंदिर में श्रद्धालुओं की आस्था वर्षों से कायम है, लेकिन मंदिर का पुराना भवन अब जीर्णोद्धार की जरूरत महसूस कर रहा है। भवन की स्थिति खराब होने के कारण इसके संरक्षण का सवाल महत्वपूर्ण हो गया है।

पुजारी परिवार अपनी क्षमता के अनुसार हर वर्ष मरम्मत कराता है, लेकिन प्राचीन मंदिर को सुरक्षित रखने और व्यवस्थित रूप से विकसित करने के लिए व्यापक कार्य की आवश्यकता है। परिवार का कहना है कि सीमित संसाधनों के कारण मंदिर के पूरे भवन का जीर्णोद्धार कराना कठिन हो रहा है।

29वीं पीढ़ी संभाल रही परंपरा, शासन से सहयोग की उम्मीद

मंदिर के पुजारी शंकर नाथ योगी के अनुसार, मंदिर मध्यप्रदेश धर्मस्व विभाग के अंतर्गत आता है। इसके बावजूद मंदिर के संरक्षण और विकास के लिए शासन की ओर से अपेक्षित सहयोग नहीं मिल पाया है। उन्होंने मंदिर की प्राचीनता और ऐतिहासिक महत्व को देखते हुए इसके जीर्णोद्धार की मांग की है।

अब सवाल यह है कि जिस मंदिर में पीढ़ियों से पूजा-अर्चना की परंपरा निभाई जा रही है, उसके संरक्षण के लिए जिम्मेदार विभाग कब आगे आएंगे? क्या नवरात्रि के इस पावन अवसर पर प्राचीन दुधाखेड़ी माता मंदिर के जीर्णोद्धार की दिशा में कोई ठोस पहल होगी?

नवरात्रि पर विशेष संदेश

दुधाखेड़ी माता मंदिर केवल पूजा-अर्चना का स्थल नहीं, बल्कि बड़ौद की धार्मिक विरासत और पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा का प्रतीक है। श्रद्धालुओं की आस्था के इस केंद्र को सुरक्षित रखना केवल पुजारी परिवार की नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण से जुड़ा विषय भी है। अब स्थानीय श्रद्धालुओं को उम्मीद है कि शासन-प्रशासन इस प्राचीन मंदिर की सुध लेकर इसके जीर्णोद्धार का मार्ग प्रशस्त करेगा।

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