उज्जैन | मध्यप्रदेश की धार्मिक राजधानी उज्जैन में भगवन श्री कृष्ण की शिक्षा स्थली है ये तो सभी को पता है लेकिन भगवान की चोथी पत्नी मित्रविन्दा भी उज्जैन की रानी थी शायद ये बहुत कम लोगो को पता होगी , उज्जैन के राजा रहे राजा जयचंद सेन की बेटी भगवान कृष्ण की पत्नी थी , इसलिए उज्जैन भगवान की शिक्षा स्थली के साथ साथ उनका ससुराल भी है।
ऐसा भी कहते हैं कि मित्रविन्दा कृष्ण की बुआ राज्याधिदेवी की कन्या थी। राज्याधिदेवी की बहिन कुंति थी। इसका मतलब यह कि मित्रविन्दा श्रीकृष्ण की चचेरी बहिन थी। मित्रविन्दा अवंतिका (उज्जैन) के राजा जयसेन की पुत्री और विन्द एवं अनुविन्द की सगी बहन थी।
अवंतिका नगरी की राजकुमारी मित्रवृंदा भगवान की 5वीं पटरानी थी। भैरवगढ़ रोड स्थित मित्रवृंदा धाम पर परम्परा अनुसार इस वर्ष भी जन्म अष्टमी का पर्व धूमधाम से मनाया जाता है यह भगवान् का ससुराल होने के चलते जन्म अष्टमी के पर्व का महत्व ही अलग है |
यह जन्माष्टमी को सर्वे भवंतु सुखिन की तर्ज पर श्रद्धालु अभिमंत्रित मोर पंख प्राप्त करने के लिए बड़ी संख्या में जुटेंगे। यहां मंदिर की गादी से अभिमंत्रित मोर पंख का वितरण किया जाएगा।
प्रदेश में हाल ही में सिहोर के कुबेरेश्वर धाम में अभिमंत्रित रूद्राक्ष का वितरण किया गया था। इसके चलते वहां के आश्रम में जमकर श्रद्धालु पहुंचे थे। इसी तर्ज पर उज्जैन के भैरवगढ़ रोड स्थित मित्रवृंदा धाम में जन्माष्टमी को मोर पंख वितरण का आयोजन प्रति वर्ष की तर्ज पर किया जा रहा है। इस वर्ष प्रदेश में जन्माष्टमी भव्य रूम में मनाई जा रही है। उज्जैन भगवान श्री कृष्ण की शिक्षा स्थली रही है। यहां सांदीपनि आश्रम के साथ नारायण स्थित कृष्ण सुदामा धाम ही नहीं सिंधिया देवस्थान ट्रस्ट के श्री द्वारकाधीश गोपाल मंदिर में जन्माष्टमी का आयोजन बड़े स्तर पर होता है।
यह होंगे दिन भर के कार्यक्रम
=जन्माष्टमी पर भगवान श्री कृष्ण के मंदिरों में आयोजन तो होंगे ही इसके साथ ही उज्जैन में उनके ससुराल रूपी कृष्ण-मित्रवृंदा धाम एवं मंदिर में यह आयोजन कुछ अलग हटकर होगा। यहां भगवान एवं उनकी 5वीं पटरानी का विशेष पूजन और आरती के साथ ही शाम को बृज रसीक अनिरूद्ध रामानूज दास महाराज की भजन संध्या का आयोजन होगा और फलहारी वितरण किया जाएगा। भगवान श्री कृष्ण का उज्जैन से शिक्षास्थली के साथ ही ससुराल का नाता भी रहा है। भगवान श्री कृष्ण का विवाह उज्जैन
राजकुमारी मित्रविदा से हुआ था । इसलिए उज्जैन भगवान का ससुराल भी है। श्रीमद्भागवत पुराण और विष्णु पुराण में वर्णित कथा के अनुसार मित्रविंदा राजा जयसेन की पुत्री थी। भगवान श्री कृष्ण ने मित्रविंदा से विवाह किया था । मित्रवृंदा उनकी 5 वीं पटरानी थी। उज्जैन के भेरवगढ़ रोड पर शिप्रा नदी के किनारे मित्रवृंदा का मंदिर है। मंदिर के पण्डित गिरीश गुरु ने बताया की यहाँ जन्माष्टमी पर्व पर भव्य आयोजन होता है। इस वर्ष भी 26 अगस्त को जन्माष्टमी पर्व पर यहाँ मंदिर में ब्रज की रास मण्डली द्वारा मनमोहक प्रस्तुति दी जाएगी।
कहा है मित्रवृंदा धाम में
धार्मिक नगरी उज्जैन के भैरवगढ़ रोड स्थित मित्रवृंदा धाम उज्जैन के प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य रहे गृहस्थ संत श्री शंकर गुरू महाराज के सानिध्य में बना विशेष मंदिर है। इस मंदिर में भगवान श्री कृष्ण के साथ उनकी 5वीं पटरानी मित्रवृंदा की प्रतिमा विराजित है । मित्रवृंदा उज्जैन के राजा जयसेन की पुत्री थी जिनसे भगवान ने पांचवां विवाह किया था। उन्हीं का यह चमत्कारी स्थल है। इसी चमत्कारी स्थल से ही गादीपति गुरू जी गिरीश शर्मा अभिमंत्रित मोरपंख का वितरण पूर्व वर्षों अनुसार करेंगे।
गादीपति गुरुजी ने बताई मोरपंख की विशेषता
मित्रवृंदा धाम के गादीपति गुरु गिरीश शर्मा बताते हैं कि नकारात्मक तरंगों से बचाने के लिए मोरपंख बहुत ही सार्थक है। उन्नति और आकस्मिक कार्य बाधाओं को इससे दूर किया जाता है। भगवान खुद मोर पंख धारण करते है । मोर पंख में सकारात्मक उर्जा की कई विशेषताएं समाहित हैं। भगवान को श्रृंगार करने के बाद नजर न लगे इसके लिए मोर पंख को धारण करवाया जाता है। सुख, शांति, उन्नति, ऊर्जा के लिए मोरपंख घर में रखा जाता है।




