प्रधानमंत्री की देशवासियों से एक वर्ष तक सोना न खरीदने की भावुक अपील ने देश के आर्थिक और सामाजिक ताने-बाने को झकझोर दिया है। इस फैसले पर आम जनता और देश के बड़े स्वर्ण व्यापारियों के बीच विचारों का एक बड़ा टकराव देखने को मिल रहा है।
140 करोड़ लोग एक कदम आगे बढ़ते हैं, तो देश भी 140 करोड़ कदम आगे बढ़ता है। इसलिए वैश्विक संकट के मौजूदा दौर में देशवासियों से मेरे कुछ विशेष आग्रह… pic.twitter.com/uO5xFHSEUL
— Narendra Modi (@narendramodi) May 11, 2026
🏪 सोना व्यापारियों का नजरिया: ‘धंधा चौपट, लाखों रोजगार खतरे में’
देश भर के सराफा संघों और स्वर्ण आभूषण निर्माताओं में इस अपील के बाद से भारी निराशा और चिंता का माहौल है। व्यापारियों ने निम्नलिखित मुख्य बिंदु सामने रखे हैं:
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- आर्थिक संकट: शादियों के सीजन में व्यापार पूरी तरह ठप होने की कगार पर पहुंच जाएगा।
- रोजगार पर वार: आभूषण निर्माण से जुड़े लाखों कारीगरों और दैनिक मजदूरों के सामने भुखमरी का संकट खड़ा होगा।
- स्टॉक का बोझ: शोरूम में डंप करोड़ों रुपये के स्टॉक पर बैंकों का ब्याज चुकाना भारी पड़ेगा।
- कालाबाजारी का डर: वैध व्यापार बंद होने से सोने की तस्करी और अवैध इनडोर ट्रेडिंग बढ़ने की आशंका है।
👥 आम जनता की सोच: ‘देशहित बनाम पारिवारिक परंपरा’
प्रधानमंत्री की इस अपील को लेकर नागरिकों के विचार दो धड़ों में बंट गए हैं:
- समर्थक वर्ग (देशहित सर्वोपरि):
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- मध्यम वर्ग का एक बड़ा हिस्सा इसे राष्ट्रहित में उठाया गया कदम मान रहा है।
- लोगों का मानना है कि सोने का आयात घटने से देश का विदेशी मुद्रा भंडार मजबूत होगा।
- आम नागरिक इस अवधि में पैसे को शेयर बाजार या सरकारी बांड में निवेश करने की योजना बना रहे हैं।
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- असहमत वर्ग (सांस्कृतिक जरूरतें):
- जिन परिवारों में शादियां तय हो चुकी हैं, वे बेहद परेशान हैं।
- भारतीय समाज में सोने को केवल आभूषण नहीं बल्कि ‘स्त्रीधन’ और संकट का साथी माना जाता है।
- ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों का कहना है कि बैंकों से ज्यादा उन्हें सोने के निवेश पर भरोसा है, जिसे अचानक नहीं बदला जा सकता।
