- मुख्यमंत्री को घेरने निकली कांग्रेस खुद विरोधाभासी बयानों में उलझी, वरिष्ठ और युवा नेतृत्व के बीच बढ़ी खींचतान
विशेष संवाददाता { Nasir Belim Rangrej}
उज्जैन/भोपाल
मध्य प्रदेश की राजनीति में इन दिनों कांग्रेस के भीतर मचा घमासान सबसे बड़ी राजनीतिक चर्चा बना हुआ है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव पर गंभीर आरोप लगाकर भाजपा सरकार को घेरने की रणनीति बनाने वाली कांग्रेस अब खुद अपने नेताओं के अलग-अलग बयानों के कारण सवालों के घेरे में आ गई है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी के लगाए गए आरोपों को पार्टी के वरिष्ठ नेता एवं पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने सार्वजनिक रूप से खारिज कर दिया, जिससे कांग्रेस की अंदरूनी कलह खुलकर सामने आ गई।
500 करोड़ की संपत्ति पर आरोप से शुरू हुआ विवाद
पूरे घटनाक्रम की शुरुआत तब हुई जब प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने उज्जैन में प्रेस वार्ता करते हुए मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव पर बड़ा आरोप लगाया। पटवारी ने दावा किया कि सरकार ने उज्जैन स्थित वीर भारत न्यास को लगभग 500 करोड़ रुपये मूल्य की सरकारी संपत्ति मात्र एक रुपये वार्षिक लीज पर देकर बड़ा आर्थिक घोटाला किया है।
पटवारी ने इस मामले को जनता के पैसे और सरकारी संपत्ति से जुड़ा बताते हुए इसकी निष्पक्ष जांच कराने की मांग भी उठाई। कांग्रेस ने इसे सरकार के संरक्षण में हुआ बड़ा भ्रष्टाचार बताया।
दिग्विजय सिंह ने बदल दी पूरी तस्वीर
लेकिन पटवारी के आरोपों के कुछ ही समय बाद पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह उज्जैन पहुंचे और उन्होंने पूरे मामले पर बिल्कुल अलग रुख अपनाया।
दिग्विजय सिंह ने कहा कि वीर भारत न्यास कोई निजी संस्था नहीं बल्कि एक शासकीय ट्रस्ट है, जिसके अध्यक्ष स्वयं मुख्यमंत्री होते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि सामाजिक, धार्मिक एवं सांस्कृतिक धरोहरों के संरक्षण के लिए प्रतीकात्मक एक रुपये वार्षिक लीज पर संपत्ति देना कोई नई व्यवस्था नहीं है, बल्कि वर्षों से चली आ रही सरकारी नीति का हिस्सा है।
यहीं नहीं, उन्होंने यह भी कहा कि इस प्रकार के भ्रामक आरोप अक्सर गलत जानकारी देने वाले लोगों द्वारा तैयार किए जाते हैं। उनके इस बयान को राजनीतिक हलकों में जीतू पटवारी के आरोपों को कमजोर करने वाला माना गया।
भाजपा को मिला बड़ा राजनीतिक हथियार
कांग्रेस के दो शीर्ष नेताओं के अलग-अलग बयानों ने भाजपा को कांग्रेस पर पलटवार करने का अवसर दे दिया।
भाजपा नेताओं ने कहा कि जब कांग्रेस के वरिष्ठ नेता ही अपने प्रदेश अध्यक्ष के आरोपों को सही नहीं मान रहे हैं, तब जनता कांग्रेस के आरोपों पर कैसे विश्वास करेगी। भाजपा ने इसे कांग्रेस की अंदरूनी अव्यवस्था और नेतृत्व संकट का प्रमाण बताया।
क्या वरिष्ठ और युवा नेतृत्व आमने-सामने है?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह विवाद केवल एक बयान का नहीं बल्कि कांग्रेस के भीतर चल रही नेतृत्व की लड़ाई का संकेत भी है।
जीतू पटवारी प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद लगातार आक्रामक राजनीति कर रहे हैं और सरकार के खिलाफ मुखर अभियान चला रहे हैं। दूसरी ओर दिग्विजय सिंह जैसे वरिष्ठ नेताओं का अलग रुख यह संकेत देता है कि पार्टी में रणनीति को लेकर एकमत स्थिति नहीं है।
भोपाल और दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि कांग्रेस के वरिष्ठ और युवा नेतृत्व के बीच वर्चस्व की लड़ाई अभी समाप्त नहीं हुई है।
जयवर्धन सिंह की राजनीति को लेकर भी चर्चाएं तेज
राजनीतिक हलकों में यह चर्चा भी जोरों पर है कि पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह अपने पुत्र एवं पूर्व मंत्री जयवर्धन सिंह के राजनीतिक भविष्य को मजबूत बनाने की रणनीति पर काम कर रहे हैं।
विश्लेषकों का मानना है कि यदि जीतू पटवारी प्रदेश स्तर पर मजबूत जननेता के रूप में स्थापित हो जाते हैं, तो भविष्य में शीर्ष नेतृत्व की दौड़ और कठिन हो सकती है। हालांकि इस विषय पर कांग्रेस की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है और यह केवल राजनीतिक अटकलों का हिस्सा है।
दिल्ली तक पहुंचा मामला, शुरू हुआ डैमेज कंट्रोल
उज्जैन और नीमच में दिए गए बयानों के बाद मामला कांग्रेस हाईकमान तक पहुंच गया। पार्टी की किरकिरी होने के बाद भोपाल में दिग्विजय सिंह और जीतू पटवारी एक साथ प्रेस वार्ता में नजर आए।
दिग्विजय सिंह ने सफाई देते हुए कहा कि उनके द्वारा इस्तेमाल किया गया “दलाल” शब्द जीतू पटवारी के लिए नहीं था बल्कि उस रिपोर्ट के संदर्भ में था जिसके आधार पर आरोप लगाए गए थे।
उन्होंने जीतू पटवारी को “पुत्र समान” बताते हुए कहा कि कांग्रेस पूरी तरह एकजुट है और सरकार के खिलाफ संघर्ष जारी रहेगा।
क्या मुस्कान के पीछे था राजनीतिक दबाव?
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि भोपाल में दोनों नेताओं की संयुक्त प्रेस वार्ता कांग्रेस की स्वाभाविक एकजुटता से अधिक डैमेज कंट्रोल की रणनीति थी।
हाल के चुनावों में लगातार कमजोर प्रदर्शन के बाद कांग्रेस नेतृत्व किसी भी कीमत पर यह संदेश बाहर नहीं जाने देना चाहता कि प्रदेश संगठन पूरी तरह बिखर चुका है। इसलिए दोनों नेताओं को एक मंच पर लाकर पार्टी ने नुकसान की भरपाई करने की कोशिश की।
प्रदेश कांग्रेस के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती
विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती भाजपा नहीं बल्कि संगठन के भीतर समन्वय बनाए रखना है। यदि वरिष्ठ और युवा नेतृत्व के बीच मतभेद सार्वजनिक रूप से सामने आते रहे तो विपक्ष की भूमिका भी कमजोर पड़ सकती है।
राजनीतिक विश्लेषण
- मुख्यमंत्री पर लगाए गए आरोपों पर कांग्रेस खुद एकमत नहीं दिखी।
- दिग्विजय सिंह के बयान ने जीतू पटवारी के आरोपों की धार कमजोर कर दी।
- भाजपा इस पूरे विवाद को कांग्रेस की अंदरूनी कलह के रूप में जनता के सामने पेश कर रही है।
- कांग्रेस अब लगातार यह संदेश देने की कोशिश कर रही है कि पार्टी पूरी तरह एकजुट है।
- आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि यह विवाद वास्तव में समाप्त होता है या प्रदेश कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति में नया अध्याय बनता है।




