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Shipra Tirtha Parikrama:राजा सद्युम्य की पौराणिक परंपरा से डॉ. मोहन यादव के जन-आंदोलन तक* आस्था और पर्यावरण का महासंगम बनी ‘शिप्रा तीर्थ परिक्रमा’

  • आस्था और पर्यावरण का महासंगम
  • 25 मई से शुरू होगी 23वीं पावन यात्रा
  • मुख्यमंत्री करेंगे शुभारंभ
  • मोक्षदायिनी के संरक्षण का संकल्प लेकर जुटेंगे हजारों श्रद्धालु
AI जनरेट शिप्रा परिक्रमा फोटो

उज्जैन, (नासिर बेलिम) । उज्जैन की धार्मिक और सांस्कृतिक धरोहर को समेटे हुए प्रसिद्ध ‘शिप्रा तीर्थ परिक्रमा’ इस वर्ष 25 मई (सोमवार) से प्रारंभ होने जा रही है। ज्येष्ठ शुक्ल नवमी से शुरू होकर यह दो दिवसीय परिक्रमा 26 मई को गंगा दशहरा (दशमी) पर संपन्न होगी । इस वर्ष यह यात्रा अपने 23वें वर्ष में प्रवेश कर रही है, जिसकी शुरुआत वर्तमान मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव द्वारा वर्षों पहले एक जन-आंदोलन के रूप में की गई थी ।

इस वर्ष संस्कृति विभाग, महाराजा विक्रमादित्य शोधपीठ और परिक्रमा समिति के संयुक्त तत्वावधान में इस यात्रा को व्यापक रूप दिया जा रहा है। यात्रा की शुरुआत 25 मई को सुबह रामघाट पर मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव द्वारा मुख्य ध्वज के पूजन और आरती के साथ होगी ।

इसके बाद साधु-संतों की अगवानी में श्रद्धालुओं का कारवां मोक्षदायिनी शिप्रा के किनारों पर स्थित पौराणिक स्थलों की परिक्रमा के लिए निकलेगा। *सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पड़ाव* परिक्रमा के दौरान शिप्रा नदी के तटों पर स्थित प्राचीन घाटों और मंदिरों में विशेष धार्मिक आयोजन होंगे। संस्कृति विभाग द्वारा यात्रा मार्ग के प्रमुख पड़ावों जैसे रामघाट, दत्त अखाड़ा, त्रिवेणी संगम और भूखी माता मंदिर पर भव्य भजन संध्या, लोक नृत्य और सांस्कृतिक प्रस्तुतियां आयोजित की जाएंगी। प्रशासन द्वारा रूट की सुरक्षा, पेयजल और छांव के लिए व्यापक इंतजाम किए जा रहे हैं ।

 

 

– इतिहास और दूरदर्शिता

*मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की सोच का परिणाम है यह यात्रा*

शिप्रा तीर्थ परिक्रमा का इतिहास उज्जैन के विकास और पर्यावरण चेतना से जुड़ा है। लगभग 22 वर्ष पूर्व (वर्ष 2004) डॉ. मोहन यादव ने एक सजग नागरिक और जनप्रशसक के रूप में इस यात्रा की नींव रखी थी। इसका मूल उद्देश्य केवल धार्मिक पर्यटन बढ़ाना नहीं, बल्कि मोक्षदायिनी शिप्रा नदी को प्रदूषण मुक्त करना और इसके जल स्रोतों को सहेजना था। आज यह यात्रा मध्य प्रदेश शासन के ‘जल गंगा संवर्धन अभियान’ का एक जीवंत प्रतीक बन चुकी है, जिसमें समाज का हर वर्ग अपनी भागीदारी सुनिश्चित करता है ।

*पौराणिक महत्व: क्यों खास है यह परिक्रमा? राजा सद्युम्य से जुड़ा है इतिहास, मिलता है अश्वमेध यज्ञ जैसा पुण्य*

उज्जैन (अवंतिकापुरी) में शिप्रा नदी मात्र एक जलधारा नहीं, बल्कि सनातन संस्कृति का साक्षात प्रतीक हैं। स्कंद पुराण के अवंतिका खंड के अनुसार, मोक्षदायिनी मां शिप्रा की परिक्रमा का फल अनंत काल तक बना रहता है। इस पावन यात्रा के धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व को शास्त्रों में विस्तार से बताया गया है

 

  • *सर्वप्रथम राजा सद्युम्य ने की थी शुरुआत: पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, सतयुग में शिव भक्त राजा सद्युम्य ने भगवान भोलेनाथ को प्रसन्न करने और अपने राजसी दायित्वों की शुद्धि के लिए अवंतिका खंड में मां शिप्रा की परिक्रमा की थी। तभी से इस भूभाग की परिक्रमा करने की परंपरा शुरू हुई।*
  • *दस प्रकार के पापों का नाश (दशविध पाप मुक्ति): यह परिक्रमा ज्येष्ठ शुक्ल नवमी और गंगा दशहरा (दशमी) के पावन योग में होती है। शास्त्रों के अनुसार, इस अवधि में शिप्रा में स्नान और परिक्रमा करने से मनुष्य के तीन कायिक (शरीर द्वारा किए गए), चार वाचिक (वाणी द्वारा किए गए) और तीन मानसिक (सोच द्वारा किए गए) सहित कुल 10 प्रकार के पापों का नाश होता है।*
  • *अश्वमेध यज्ञ के समान फल: वराह पुराण में उल्लेख है कि अवंतिका क्षेत्र में शिप्रा के तटों की परिक्रमा करने से श्रद्धालु को एक हजार अश्वमेध यज्ञ और सौ वाजपेय यज्ञ करने के समान पुण्य फल प्राप्त होता है।*
  • *अमृत तत्व की प्राप्ति: समुद्र मंथन के दौरान जब देव-असुर संग्राम हुआ, तब अमृत कुंभ की कुछ बूंदें शिप्रा नदी में भी गिरी थीं। इसी कारण इस नदी को ‘अमृतसंभवा’ भी कहा जाता है। गंगा दशहरा पर इसकी परिक्रमा करने से जातक को आरोग्य और दीर्घायु का वरदान मिलता है।*
  • *अवंतिका के चौरासी महादेव का आशीष: शिप्रा नदी उज्जैन के चौरासी महादेव, अष्ट भैरव और नवग्रहों (विशेषकर मंगलनाथ) को अपने आंचल में समेटे हुए बहती है। नदी की परिक्रमा करने से इन सभी पौराणिक तीर्थों की परिक्रमा स्वतः ही पूरी हो जाती है, जिससे पितृदोष और ग्रहों की बाधाओं से मुक्ति मिलती है।*
  1. *मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और शिप्रा परिक्रमा: एक नागरिक की पहल जो बना जन-आंदोलन*

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का शिप्रा तीर्थ परिक्रमा से नाता सिर्फ एक जनप्रतिनिधि या मुख्य अतिथि का नहीं है, बल्कि वे इस पूरी यात्रा के जनक और सूत्रधार हैं। आज से 22 वर्ष पहले शुरू हुई इस यात्रा के पीछे डॉ. यादव की गहरी धार्मिक आस्था और पर्यावरण के प्रति उनकी दूरदर्शिता रही है।

  • *एक जन-अभियान के रूप में रखी नींव: वर्ष 2004 के आस-पास, जब डॉ. मोहन यादव उज्जैन के एक सामाजिक-सांस्कृतिक कार्यकर्ता और छात्र राजनीति से उभरते हुए नेता थे, तब उन्होंने महसूस किया कि शिप्रा नदी को केवल भाषणों से नहीं, बल्कि जन-भागीदारी से बचाया जा सकता है। उन्होंने राजनीतिक सीमाओं से ऊपर उठकर आम जनता और संतों को जोड़कर इस परिक्रमा की शुरुआत की।*
  • *खुद पैदल चलकर तय करते थे मार्ग: शुरुआती वर्षों में डॉ. मोहन यादव स्वयं एक आम श्रद्धालु की तरह हाथों में भगवा ध्वज थामकर, नंगे पैर शिप्रा के पथरीले और ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर चलते थे। वे यात्रा के दौरान श्रद्धालुओं के रहने, भोजन और भजनों की व्यवस्था खुद अपनी देखरेख में करवाते थे।*
  • *सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और पर्यावरण का मेल: डॉ. यादव का हमेशा से मानना रहा है कि नदियां हमारी सभ्यता की जीवन रेखा हैं। उन्होंने इस यात्रा को सिर्फ ‘कर्मकांड’ नहीं रहने दिया, बल्कि इसे ‘जल गंगा संवर्धन अभियान’ और पर्यावरण चेतना से जोड़ा, ताकि युवा पीढ़ी अपनी पौराणिक नदियों के संरक्षण के लिए आगे आए।*
  • *मुख्यमंत्री बनने के बाद भी बरकरार है नाता: उज्जैन उनका गृह नगर है और मुख्यमंत्री बनने के बाद भी इस यात्रा के प्रति उनका जुड़ाव कम नहीं हुआ है। इस वर्ष (2026) भी वे प्रदेश के मुखिया के तौर पर स्वयं रामघाट पहुंचकर महाआरती करेंगे और मुख्य ध्वज का पूजन कर यात्रा की शुरुआत करेंगे, जो यह दिखाता है कि मुख्यमंत्री बनने के बाद भी वे अपनी जड़ों और प्राथमिकताओं को नहीं भूले हैं।*

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