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44 डिग्री, एक खंभा और पूरा शहर” – एक लाइनमैन की अनकही कहानी

*जनसंवाद एक्सप्रेस विशेष / नासिर बेलिम रंगरेज  ।* दोपहर के 2 बज रहे हैं। सड़क पर खड़े-खड़े चप्पल पिघल रही है। मौसम विभाग का थर्मामीटर 44 डिग्री दिखा रहा है, पर बिजली के खंभे का लोहा 60 डिग्री से कम नहीं।

आपके ड्राइंग रूम का AC 24 पर है। बच्चे कार्टून देख रहे हैं। तभी लाइट चली गई। 7 मिनट… 8 मिनट… 9 मिनट।

10वां मिनट लगते ही आपका फोन घूम जाता है – “हेलो, लाइट कब आएगी? इतनी गर्मी में कैसे रहें?”

दूसरी तरफ JE का फोन लाइनमैन रामसिंह रावत के पास बज रहा है – “रामसिंह, कलेक्टर बंगला और हॉस्पिटल फीडर डाउन है। 15 मिनट में लाइन चालू चाहिए। ऊपर से प्रेशर है।”

सुबह 11 बजे: रामसिंह का घर

गुड़िया को 102 बुखार है। पत्नी सुमन ने कहा – “शाम को डॉक्टर को दिखा देना। दवा खत्म हो गई है।”
रामसिंह ने बेटी का माथा चूमा। हेलमेट उठाया। 8 साल पुराना सेफ्टी बेल्ट, जिसकी सिलाई खुद की थी, कमर पर कसा।
“बस आधे घंटे का काम है। फॉल्ट क्लियर करके सीधा डॉक्टर के पास,” कहकर निकल गया।

जेब में सिर्फ 200 रुपये। महीने की 20 तारीख है। तनख्वाह अभी 10 दिन दूर।

दोपहर 2:35 बजे: स्पॉट पर

फॉल्ट लोकेशन – हरसिद्धि फीडर का डीपी। ट्रांसफार्मर से धुआं निकल रहा था। नीचे 200 घर, 3 बर्फ फैक्ट्री, एक प्राइवेट हॉस्पिटल की लाइन बंद।

रामसिंह ने कंट्रोल रूम से परमिट लिया – “लाइन बंद है साहब?”
“हां, बंद है। चढ़ जा।”

ये काम ही जान जोखिम वाला है करंट किसी इन्सान को पहचान कर नही लगता

परमिट मिल गया, लेकिन रामसिंह जानता है – कई बार “बैक फीड” आ जाता है। 11 KV का एक झटका और आदमी कोयला।

खंभे पर चढ़ने से पहले उसने पानी की बॉटल सिर पर उड़ेली। सीमेंट का खंभा तवे-सा दहक रहा था। दस्तानों के अंदर हाथ जल रहे थे। 30 फीट ऊपर पहुंचा तो नीचे देख चक्कर आ गया। धूप, गर्मी, और हवा का एक झोंका भी नहीं।

 

“जम्पर ही ढीला है। 5 मिनट में कस दूं तो आधे शहर के कूलर चल पड़ेंगे,” उसने खुद को दिलासा दी।

तभी एक कबूतर उड़ता हुआ फेज-टू-फेज तारों के बीच फंस गया। जोर का स्पार्क। तार हिले। रामसिंह का रिंच छिटककर जमीन पर। कंधा हल्का सा तार से छू गया।

440 वोल्ट का झटका। शरीर अकड़ गया। आंखों के सामने अंधेरा। सिर्फ गुड़िया की आवाज – “पापा, आपने जल्दी आने का बोला था।”

पुराने बेल्ट ने जान बचा ली। खंभे से लटक गया। नीचे हेल्पर चिल्लाया – “भैया को करंट लगा!”

5 मिनट तक सांस अटकी रही। फिर होश आया। कांपते हाथों से जम्पर कसा। नीचे चिल्लाया – “चालू करो लाइन!”

दोपहर 2:53 बजे: आपके घर

AC का कंप्रेसर फिर से घरघराया। कूलर की हवा चली। आपने चैन की सांस ली। पत्नी बोली – “थैंक गॉड, लाइट आ गई। इन लोगों को गाली दिए बिना काम नहीं होता।” किसी ने ये नहीं पूछा कि लाइट लाने वाला जिंदा लौटा या नहीं।

शाम 7:00 बजे: रामसिंह का घर

कंधे पर थर्ड डिग्री बर्न। यूनिफॉर्म पर खून और पसीने के नमक की सफेद परत। गुड़िया दौड़कर आई – “पापा, आप लेट हो गए। देखो, लाइट आ गई थी। मैंने आपके लिए मटके का पानी रखा है।

सुमन ने बिना कुछ बोले बर्नोल लगाई। टीवी पर ब्रेकिंग न्यूज – “भीषण गर्मी में बिजली कटौती से शहर त्रस्त, विद्युत विभाग की लापरवाही उजागर।

रामसिंह ने टीवी बंद कर दिया। दर्द कंधे में नहीं था। दर्द इस बात का था कि 44 डिग्री में जब वो खंभे पर मौत से लड़ रहा था, नीचे लोग उसे “कामचोर” समझ रहे थे।

जब घर में लाइट चली जाती है तो उपभोगता लाइन मेन पर झल्लाते है
रात 11 बजे: रजिस्टर में एंट्री

“फॉल्ट क्लियर – 18 मिनट। कंज्यूमर कंप्लेंट – 37 कॉल। स्टाफ इंजर्ड – निल।”

निल” लिखते हुए हेल्पर की आंख भर आई। साहब, इंजर्ड तो हुआ था। पर रिपोर्ट में लिखेंगे तो इंक्वायरी बैठ जाएगी। और इंक्वायरी का मतलब – 3 महीने तनख्वाह रुकना। घर पर गुड़िया सो चुकी थी। उसकी दवा अभी भी बाकी थी।

हम कब समझेंगे?
1. 10 मिनट का सब्र: फॉल्ट ढूंढने, परमिट लेने, खंभे पर चढ़ने में वक्त लगता है। वो कोई स्विच नहीं जो आपने दबाया और लाइट आ गई।
2. एक बोतल पानी: अगली बार कोई लाइनमैन गली में दिखे, गाली की जगह पानी पूछ लेना। वो 44 डिग्री में आपके AC के लिए चढ़ा है।
3. थैंक्यू बोलिए: लाइट आने पर एक बार फोन करके "शाबाश" कह दीजिए। यकीन मानिए, उसके जलने का दर्द आधा हो जाएगा।

क्योंकि जब पूरा शहर कूलर की हवा में चैन से सोता है, एक लाइनमैन खंभे पर टंगा हुआ पूरे शहर का आसमान अपने कंधों पर उठाता है।उसके घर में भी एक गुड़िया है। उसे भी बुखार आता है। फर्क सिर्फ इतना है कि उसके पापा की “ड्यूटी” कभी ऑफ नहीं होती।

जनसंवाद एक्सप्रेस ने लाइन मेंन को कहा थैंक्स क्या आप भी बोलेंगे
    • “जब पूरी दुनिया अंधेरे में होती है, तब एक लाइन मेन  हमारे घरों को रोशन करने के लिए अपनी जान जोखिम में डालते हैं। 🙏
    • “आंधी हो या तूफान, गर्मी हो या बरसात… एक लाइन मेन की  ड्यूटी हमेशा सबसे पहले रहती है। 
    • “अपने बच्चों की परेशानी और त्योहारों को छोड़कर, दूसरों के घरों में उज्‍ज्वला लाने वाले हर विद्युत कर्मचारी  असली हीरो हीरो होते ईद हो या दीपावली आपके घर में लाइट ना जाए इस बात की चिंता उसे रहती है , चाहे उसके घर बच्चे बीवी इंतजार कर रहे हो |
    •                                                                                   थैंक यू, लाइनमैन!"


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