सिंगरौली। जनप्रतिनिधियों की जनसुनवाई का उद्देश्य आम जनता की समस्याओं को सुनकर उनका समयबद्ध निराकरण कराना होता है। लेकिन सिंगरौली जिले में सांसद की जनसुनवाई को लेकर अब सवाल उठने लगे हैं। आरोप है कि जनसुनवाई में आवेदन तो लिए जा रहे हैं, सोशल मीडिया पर फोटो भी पोस्ट हो रही हैं, लेकिन कई आवेदनों पर महीनों बाद भी कार्रवाई की स्थिति स्पष्ट नहीं है।
जमीन विवाद में जांच के निर्देश, फिर क्या हुआ?
ऐसा ही एक मामला जमीन विवाद से जुड़ा है। पीड़ित का आरोप है कि उसकी जमीन को फर्जी एग्रीमेंट के आधार पर हड़पने का प्रयास किया गया। वह शिकायत लेकर सांसद की जनसुनवाई में पहुंचा। बताया जाता है कि सांसद ने मामले को गंभीरता से लेते हुए मौके पर मौजूद एसडीएम को आवेदन सौंपकर जांच के निर्देश दिए थे। पीड़ित को उम्मीद थी कि अब कार्रवाई होगी, लेकिन महीनों बाद भी उसे जांच की प्रगति की कोई जानकारी नहीं मिली है।
कोतवाली के चक्कर, FIR तक नहीं
पीड़ित का कहना है कि वह कार्रवाई की उम्मीद में कोतवाली भी गया, लेकिन उसे यह कहकर लौटा दिया गया कि मामला न्यायालय से संबंधित है। सवाल उठता है कि यदि शिकायत में फर्जी दस्तावेज और धोखाधड़ी का आरोप है तो क्या पुलिस प्राथमिक जांच से बच सकती है? यदि संज्ञेय अपराध बनता है तो जांच की जिम्मेदारी किसकी है?
अधिकारी बदले, फाइल वहीं
पीड़ित का दावा है कि इस दौरान संबंधित थाना प्रभारी का ट्रांसफर और प्रमोशन भी हो गया, लेकिन उसकी शिकायत का निराकरण नहीं हुआ। यानी अधिकारी बदल गए, समय बीत गया, पर समस्या जस की तस बनी हुई है।
मॉनिटरिंग का सवाल
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जनसुनवाई में दिए गए आवेदनों की मॉनिटरिंग कौन करता है? सांसद द्वारा अधिकारी को आवेदन देने के बाद उसकी प्रगति रिपोर्ट ली जाती है या नहीं? और आवेदक को उसकी जानकारी क्यों नहीं दी जाती? जनसुनवाई की सफलता आवेदनों की संख्या या सोशल मीडिया पोस्ट से नहीं, बल्कि कितने मामलों में कार्रवाई हुई, इससे तय होनी चाहिए।
जब तक फोटो और पोस्ट से आगे बढ़कर जमीनी स्तर पर कार्रवाई नहीं होगी, तब तक आम आदमी का सवाल बना रहेगा कि आखिर वह जाए तो जाए कहां?


