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राजनीतिक संपादक (विशेष विश्लेषण):
नासिर बेलिम (सम्पादक) //लोकेशन -उज्जैन Jansamvad Express Digital National Desk*नमस्कार, आज हम बात करेंगे मध्यप्रदेश की राजनीति के चाणक्य कहे जाने वाले वरिष्ठ कांग्रेस नेता और पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह की 950 किलोमीटर की प्रस्तावित पैदल यात्रा की।*
भारतीय राजनीति में ‘यात्राओं’ का अपना एक महत्व और इतिहास रहा है, लेकिन जब राजनीति के सबसे चतुर और अनुभवी रणनीतिकारों में से एक, मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह 80 वर्ष की उम्र में किसी नई यात्रा का शंखनाद करते हैं, तो दिल्ली से लेकर भोपाल तक के सियासी गलियारों में सुगबुगाहट तेज होना लाजिमी है।
बात कर रहे है दिग्विजय सिंह राजा साहब की 20 अक्टूबर विजयादशमी से उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर (शिवधाम) से शुरू होकर ओरछा के रामराजा दरबार होते हुए अयोध्या (रामधाम) तक जाने वाली 950 किलोमीटर लंबी ‘सत्य सनातन स्वाभिमान यात्रा‘ की | जो भारतीय राजनीति में एक नए वैचारिक अध्याय की शुरुआत कर रही है।
आज के राजनीतिक विश्लेषण में हम समझेंगे कि क्यों यह यात्रा साधारण राजनीतिक विरोध प्रदर्शनों से अलग है और दिग्विजय सिंह इसके जरिए देश के सामाजिक-राजनीतिक पटल पर क्या संदेश देना चाहते हैं:
1. वैचारिक पुनर्संरचना: ‘सावरकर के हिंदुत्व’ बनाम ‘आदि शंकराचार्य का सनातन’
दिग्विजय सिंह इस यात्रा के जरिए देश में चल रहे धार्मिक विमर्श (Discourse) को एक नई दिशा दे रहे हैं। उनका मूल तर्क यह है कि ‘हिंदुत्व’ (जो विनायक दामोदर सावरकर द्वारा गढ़ा गया एक राजनीतिक शब्द है) और प्राचीन ‘सनातन धर्म’ दो अलग-अलग अवधारणाएं हैं।
- दार्शनिक गहराई: मानना है कि संघ (RSS) और विश्व हिंदू परिषद (VHP) ने धर्म को राजनीतिक लाभ के लिए ‘संकीर्ण’ बना दिया है इस यात्रा के माध्यम से वे स्वामी विवेकानंद और आदि शंकराचार्य के उस ‘उदार सनातन धर्म’ को पुनर्जीवित करने का प्रयास कर रहे हैं जो सबको समाहित करता है—“वसुधैव कुटुंबकम”।
- रणनीति: यह बीजेपी के ‘कोर वोट बैंक’ पर सीधी वैचारिक चोट है। वे हिंदुओं को यह संदेश दे रहे हैं कि आस्था पर किसी एक राजनीतिक दल का पेटेंट (एकाधिकार) नहीं हो सकता।
2. ‘सत्य, धर्म और न्याय’ का पैमाना: चंदे और पारदर्शिता पर गंभीर सवाल
दिग्विजय सिंह ने इस गैर-राजनीतिक यात्रा का मूल ध्येय वाक्य ‘यतो धर्मस्ततो जयः’ (जहाँ धर्म है, वहाँ विजय है) रखा है। उन्होंने इस यात्रा को सीधे तौर पर ‘चंदा चोरी’ और ‘वोट चोरी’ के खिलाफ एक जन-आंदोलन के रूप में पेश किया है
- पारदर्शिता की मांग: राम मंदिर और महाकाल मंदिर में कथित वित्तीय अनियमितताओं और चढ़ावे के उपयोग पर सवाल उठाकर, वे खुद को नास्तिक या धर्म-विरोधी नहीं, बल्कि “एक जागरूक रामभक्त और शिवभक्त” के रूप में स्थापित कर रहे हैं।
- जवाबदेही: वे अयोध्या पहुंचकर इस संबंध में एक औपचारिक याचिका (Petition) भी दायर करेंगे। सिंह का यह तर्क कि “भगवान के नाम पर होने वाले भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाना ही सच्चा धर्म है”, आम धार्मिक जनता के मानस को झकझोरने की क्षमता रखता है।
3. ‘नर्मदा परिक्रमा’ का अनुभव और जमीनी जुड़ाव की ताकत
दिग्विजय सिंह की इस उम्र में 950 किमी पैदल चलने की क्षमता उनके धुर विरोधियों को भी अचंभित करती है।
- जमीनी हकीकत: साल 2017 में उनकी 3,300 किलोमीटर से अधिक लंबी ‘नर्मदा परिक्रमा’ ने यह साबित किया था कि वे वातानुकूलित कमरों के नेता नहीं, बल्कि धूल-मिट्टी और पसीने के बीच जनता से सीधे संवाद करने वाले (Mass Leader) हैं।
- सद्भावना दूत: इस यात्रा में वे रोज़ाना 15 किमी चलेंगे, पांच पवित्र नदियों का जल लेकर जाएंगे, और बिना किसी राजनीतिक तामझाम के ग्रामीण अंचलों के लोगों से सीधा संवाद करेंगे। यह तरीका भारत की पारंपरिक ‘संन्यासी और लोक-संवाद’ की संस्कृति से मेल खाता है, जिसे भारतीय समाज हमेशा से सम्मान देता आया है।
4. कांग्रेस के ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ के नए शिल्पकार
लंबे समय से कांग्रेस पर ‘अल्पसंख्यक तुष्टिकरण’ का आरोप लगता रहा है, जिसने पार्टी को चुनावी नुकसान पहुँचाया है। राहुल गांधी की केदारनाथ और महाकाल यात्राओं के बाद, अब दिग्विजय सिंह की यह लंबी अयोध्या पदयात्रा कांग्रेस के वैचारिक रुख को एक नया संतुलन (Balancing Act) प्रदान कर रही है।
- वे यह साबित कर रहे हैं कि अल्पसंख्यक अधिकारों की बात करने के साथ-साथ एक नेता पूर्णतः निष्ठावान सनातनी हिंदू भी हो सकता है।
विश्लेषणात्मक निष्कर्ष
दिग्विजय सिंह की ‘सत्य सनातन स्वाभिमान यात्रा‘ को केवल 2026 या आगामी चुनावों के चश्मे से देखना भूल होगी। यह यात्रा उनके राजनीतिक जीवन की एक बड़ी वैचारिक विरासत को तय करने वाली है।
80 की उम्र में पत्नी अमृता राय के साथ देश के दो सबसे बड़े धार्मिक केंद्रों (उज्जैन से अयोध्या) को पैदल जोड़कर, वे देश की राजनीति के सामने एक लकीर खींच रहे हैं—कि “सत्ता की राजनीति क्षणिक हो सकती है, लेकिन सत्य और सनातन का स्वाभिमान शाश्वत है।” यदि वे इस यात्रा के दौरान ग्रामीण जनता के दिलों में ‘सच्चे सनातन’ और ‘पारदर्शिता’ के सवाल को उतारने में सफल रहे, तो यह भारतीय राजनीति का एक ऐतिहासिक टर्निंग पॉइंट साबित हो सकता है।


